शनिवार, अप्रैल 14, 2012

तुम भी साथ नही


क्या करें हम शिकायत किसी से, खुदगर्ज जमाना है।
जो महसूसे न दर्द,  क्यूं उसे अपना दर्द दिखलाना है।

मुझको अपनी ही चीखों का शोर सुनाई देता है अक्सर,
खोते-खोते जान लिया अब, उसको भी खो जाना है।

मुठ्ठी में चिंगारी और जख्मों की आहट सुनी मैंने,
कैसी जोड़ी प्रीत तुझसे , जो नश्तर सा चुभ जाना है।

सूनी राहें, मंजिल अंजानी और तुम भी साथ नहीं,
अपनापन पाने की चाह में मुझको चलते जाना है।

अंजाम  की  फ्रिक  में आगाज की वेदना सही मैंने,
पुरानी उम्मीदें छोड़नी हैं, अब नए सपने  देखना है।

  • कोमल वर्मा  ‘कनक’

शनिवार, अप्रैल 07, 2012

प्रीत से पोषित हो मन



नवीन है प्रेम मेरा, दिल अधिकार चाहे।
और अब कलियों पर है भंवरे मंडराए।
रस्म नई है धरा की, पर क्षितिज नहीं,
आओ हम गगन-धरा सा मिल जाएं।

चाहा मैंने रच लूं अपने जीवन का गौरव,
रचने में इतिहास, मुझको विश्वास नहीं।
जीवन के शब्द सिमट जाएं पन्नों में,
मुझको तो रही कभी ऐसी आस नहीं।


जब मिलना हो तुमको, मुझसे इस दुनिया में,
सदा करना तुम, सौम्य प्रणय अनुकरण।
फिर रीत का न करना उद्भेदन तुम,
प्रीत से पोषित हो मन, निष्ठा का वरण।


मन की नौका जल पर स्थिर है जब,
क्यूं खिलवाड़ करें हम दोनों लहरों से।
मंजिल पा ही लेंगे इक दिन हम अपनी,
राहें लाख घिरीं हों चाहे पहरों से।

  • कोमल वर्मा कनक


बुधवार, मार्च 28, 2012

निगाहों में बसा लो मुझको


खुशबूओं को मिले रास्ता, गुलों की ख्वाहिश है।
मत बांधो वेग को, हवाओं   की यह गुजारिश है।

परिन्दों को दिया हौसला, आकाश ने परवाज का,
सांझ को लौट आएंगें, शजर की यह ख्वाहिश है।

यह  जख्म  आखिरी  हो,  हमदम  चाहती हूं मैं,
आंचल डाल दूं, नहीं कोई जख्म-ए-नुमाइश है।

जो  कह  दूं चाहते  कम  हो, सादगी  है  यह  हमारी,
कम न लगे तुम्हें कभी, इश्क की यह आजमाइश है।

अपने  दिल  की  दुनियां  में  दे  दो पनाह मुझको,
निगाहों में बसा लो मुझको, हमारी यह गुजारिश है।

  • कोमल वर्मा  ‘कनक’


शनिवार, मार्च 24, 2012

रिश्ता


गुमनाम नहीं, पर है कोई नाम नहीं।
रिश्ते की है आहट नई, इंकार नहीं।

उसकी आवाज रस घोले कानों में,
मुझको जो देता है दिखलाई नहीं।

कोमल सा अहसास है मेरे मन का यह,
चाहा जिसने मुझको, वो मेरे पास नहीं।

अब तो जीवन-मृत्यु तक है रिश्ता उससे,
प्रेम  दृष्टि में मेरा मन अब अस्थिर नहीं।


जब तलक सांसों में है अंकुर,
छूटे अपना तब तक हाथों से हाथ नहीं।

  • कोमल वर्मा ‘कनक’

गुरुवार, मार्च 15, 2012

कोशिश की मैनें


चुन-चुन कर जोड़ी मैनें खुशियां।
और फिर सराबोर हुई मैं इसमें ।

जब देखा आंचल अपना मैनें ,
दामन खाली था पिघल गई मैं।

जो आस लगाई वो झूठी निकली,
आंखों में जब प्रीत सजाई मैनें।

कुछ फूलों ने अश्कों को सहलाया था,
जो बनकर फिर खार चुभे मुझको।

जो बुने थे  सपने वो रहे अधूरे, लेकिन ,
उनमें रंग भरने की कोशिश की मैनें।

पलकों से बरस जाती है कुछ बूंदें,
पर मेरे  हृदय ने धरा है अब धीरज।

  • कोमल वर्मा  ‘कनक’


बुधवार, अगस्त 24, 2011

ख्वाहिश है मेरी ....।


जिंदगी का सफर आसां हो जाये,
यह मोड़ भी रूखसत हो जाये।
खुद को खोजना बाकी ही कहां रहे,
जो तू मुझ तक पहुंच जाये।

जिंदगी के तमाम लम्हों का कर लें हिसाब,
आओ किसी मोड़ पर थोड़ा ठहर जायें।
मेरी सांसों की तरह अटका हुआ कोई लम्हा,
किसी टहनी पर कहीं छूट न जाये।

मौत के सफर का मुसाफिर जिन्दा रहे,
राह में तेरी याद की ताबीर लिपट जाये।
मंजिल से दूर रहने की सजा काट लूंगी,
बस तू मेरी राह की तकदीर बन जाये।

मेरी मुस्कुराहटों ने की है मेरे दर्द की पर्देदारी,
कि क्यूं तेरे दिये जख्म दिखलायें जाये।
मेरी चाहत, मेरी सोच तुझ तक जाकर जाती है ठहर,
तेरी यादों में मैं भी हूं शुमार इतना यकीं हो जाये।

करूंगी न जिक्र कभी तेरे-मेरे गुनाहों का,
चाहे मुझको कैसी भी सजा हो जाये।
खुदा की बन्दगी में मेरे साथ,
तू भी कभी शामिल हो जाये।

सोचती हूं मैं, जिस्म का जिल्द,
चाहे मौसम की तरह बदल जाये।
रूह में रहे तू सदा, मन न बदले कभी,
ख्वाहिश है मेरी, बस इतना हो जाये।

मेरी तन्हाई, मेरी उदासी पूछती है तेरा ठिकाना,
कभी गुजरे तू इधर से, ठिठककर रुक जाये।
अश्क में, तेरे अक्स पर रक्स होगा मुझको,
हकीकत भी तू था, यादों में भी तू, हम हर-सूं तुझे पायें।

  • कोमल वर्मा

गुरुवार, अगस्त 04, 2011

मधुर कंठ का अनुबंध


मधुर तनय सा मुझको अंग दिया,
जब ईश्वर ने यौवन संग दिया।
रहूं चहकती मैं हर पल ,जो,
जीवन मेरा प्रेम से रंग दिया।
परवाज करूं तूफानों में भी हरदम,
अम्बर सा जो तुमने आंचल दिया।
श्रृंगार किया, निखरा रूप प्रकृति का,
मधुर कंठ का मुझको अनुबंध दिया।
प्रीत भिगोयी निश्छल जल में मैनें,
अधरों को शब्दों का अपनापन दिया।
अनुराग का अनुबंध सहेज रखे मन,
सभी ने तुझको कोमल सम्मान दिया।

कोमल वर्मा