मंगलवार, जून 14, 2011

खामोशियां भी चीखती हैं ......


- कोमल वर्मा

कभी-कभी कुछ लम्हे स्मृति पर ऐसी छाप छोड़ जाते हैं कि गाहे-बगाहे वह याद आ ही जाते हैं या यूं कहें पीछा करते ही रहते हैं फिर या तो इंसान उनमें रम जाता है या उनका साथ छोड़ दुनिया से विदा ले लेता है। ऐसी कितनी ही कमजोर और खामोश परछाइयां हमारे आसपास विचरण करती रहती हैं उनमें से जब भी किसी की आपबीती सामने आती है तो दिल छलनी सा हो जाता है। विश्वास ही नहीं हो पाता कि इतनी तकलीफें उठाकर कोई चल भी कैसे लेता है। आज फिर अखबार के पन्ने पलट रही थी तो फिर वही बलात्कार की खबरें सामने आईं। फिर मन कसैला हो गया और याद आ गई नीरजा। मां से सुना था उसके बारे में। यही कोई चौदह वर्ष की ही तो थी जब उसका बलात्कार हुआ था। दुबली, पतली सांवली सी और बेहद खामोश रहने वाली नीरजा के साथ उसकी ही बस्ती के बीस वर्षीय युवक ने बलात्कार किया था। परिवार के नाम पर केवल मां और हालात के नाम पर हद से ज्यादा गरीबी, तंगहाली...। नीरजा का कसूर उसका लड़की होना था या कुछ और ये तो नहीं बता सकती पर सोच के दायरे यहां सीमित हो जाते हैं। इंसान इस कांक्रीट के जंगल में पशु ही बन गया है जहां न दिल है न दिमाग, भावनाएं और एहसास तो जाने किस गली में मुड़ गए। नीरजा की कोई गलती न थी फिर भी सबकी गलत निगाहें उसके पीछे थीं। जल्द ही यह भी पता लगा कि वह गर्भवती है। मात्र चौदह वर्ष की, हद से ज्यादा गरीब, नीरजा डॉक्टर, दवा, अस्पताल... क्या करती। जिसने उस पर दाग लगाया वो भी खुलेआम किसी और नीरजा को घायल करने के लिए घूम रहा था। नीरजा की मां भी उसके पैदा होने पर अफसोस जताती रहती थी। बेचारी नीरजा समाज और मां के कुठाराघात को कैसे अपने कोमल हृदय पर सहन करती होगी। हम, आप तो इसकी कल्पना मात्र से ही सिहर उठते हैं। उसे तो ये जबरन का दुख झेलना ही था। खैर... नौ माह बाद नीरजा ने एक नन्ही सी प्यारी सी बेटी को जन्म दिया। उस जिले के पुलिसिया अफसरान व हवलदार ईश्वर के दूत ही थे शायद, सारी दवा, अस्पताल का खर्च सब मिलजुलकर उठा लिया। एक ही स्थान पर भिन्न-भिन्न मानसिकता के लोग....। शिक्षा का अंतर होगा शायद........। पर जो भी हो नीरजा पन्द्रह वर्ष की उम्र में मां भी बन गई। बिन ब्याही मां...। कुछ भी हो कहीं न कहीं उसने एक महान और उच्च स्थान प्राप्त कर लिया था। एक नन्हे शरीर का स्पर्श जो उसका अपना अंश था। उसके एहसास का अद्भुद सुख उसे मिल चुका था। ये भी इंसान की एक प्रकृति होती है। वह दुख के दिनों का ज्यादा समय अपने पास नहीं रखना चाहता।  हमेशा उन्हें धक्का मारकर सुख के लिए रास्ते बनाने का प्रयासत्न करता रहता है। मन ही मन नीरजा की बच्ची के लिए आशीर्वाद निकल रहा था। दूसरे दिन ही अस्पताल से खबर आई कि नीरजा ने अपनी बच्ची को गला घोंटकर मार दिया। उफ्फ...। हृदय जैसे मुंह को आ गया। मुझे इतना दर्द इतनी पीड़ा हो रही थी मानो मेरी अपनी बच्ची थी। फिर नीरजा ने ऐसा क्यूं किया...। उसने उसे नौ माह तक अपने गर्भ में पल्लवित किया था। एक जननी भला अपनी ममता को कैसे छलनी कर सकती है। उसका कोमल स्नेहिल एहसास...........। हे ईश्वर वह इतनी निर्मन थी। नीरजा जो शुरू से ही खामोश थी वह मरी बच्ची को खामोशी से देखे जा रही थी। न आंखों में कोई अपराध बोध न हृदय में पश्चाताप। पूछने पर कि उसने ऐसा क्यूं किया तो मासूमियत से बोली मां कह रही थी तेरी लड़की है तू ही संभाल। तो मैंने सोचा मां मुझे न संभाल पाई तो मैं इसे कैसे...। हत्या के मामले में उसे गिरफ्तार कर बाल सुधार गृह भेज दिया गया। इस बात को आज छ: वर्ष हो चुके हैं अब तो वह बालिग होकर सुधार गृह जेल से भी आ चुकी होगी और हत्यारी मां का लेवल चस्पा हो चुका होगा। पर क्या अब भी उसे अपने अपराध का एहसास होगा या फिर उसकी खामोशियां यूं ही चीखती होंगी। हम मानव हैं, विकास चाहते हंै, बुद्धिमान हैं परंतु इतने भी हैवान नहीं कि किसी नाबालिग असहाय के साथ ऐसा व्यवहार करें व ऐसा करने वालों को खुला घूमने दें। कानून ने हमें कई सुविधाएं दी हैं पर उसकी पेचीदा गलियां और दुर्गम रास्ते, पीड़ा को उस द्वार तक पहुंचते ही नहीं देते। औरत के चरित्र को दैहिकता से जोड़े रखने की सामाजिक वजहें बहुत सीधी-साधी नहीं, काफी गहरी और जटिल रही हैं। उनको समझे बगैर इस बात को नहीं समझा जा सकता कि क्यों दैहिक आचरण को ही हमने स्त्री के चरित्र का सबसे बड़ा और कभी-कभी तो एकमात्र पैमाना मान लिया है। शायद इसी मानसिकता के चलते बलात्कार के पर्यायवाची शब्दों में इज्जत, अस्मत जैसे शब्द आते हैं। बलात्कार होने पर इज्जत लुट गई, अस्मत लुट गई, सब कुछ चला गया, किसी को मुँह दिखाने काबिल नहीं रही, आँख मिलाने लायक नहीं रही, मुँह पर कालिख पुत गई वगैरह।
समझ नहीं आता कि जिसने कुछ गलत नहीं किया उसकी इज्जत क्यों गई? उसे शर्म क्यों आई? ठीक है, एक हादसा था। जैसे दुनिया में अन्य हादसे होते हैं और समय के साथ चोट भरती है वैसी ही यह बात होनी चाहिए। मगर नहीं होती। सिर्फ और सिर्फ औरत के लिए ही यौन शुचिता के आग्रह के चलते हम घटना को कलंक बनाकर शिकार के माथे पर सदा-सर्वदा के लिए थोप देते हैं। लेकिन वह खामोश नजरें जब चीखती हंै तो मानवता लहूलुहान हो जाती है।
 भीगे आंचल की बूंदे जब 
आंखो से टप टप बहती है
वो ममता बहुत रूलाती है 
उस पल की याद दिलाती है...

3 टिप्‍पणियां:

  1. मेरे क्षेत्र से बाहर है इस पर टिप्पणी करना.

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  2. धन्यबाद कनक जी, मार्मिक और हृदयस्पर्शी वर्णन...

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  3. atul ji pratikriya ke liye dhanyad age bhi sambad bnaye rakhe..

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