मुश्किल में हैं चाहत मेरी, अब नए पथ पर।
मन चाहे तुझको, वक्त कहे प्रणय का त्याग कर।

आहिस्ता-आहिस्ता ही सही, पहुंचना है मंजिल पर।
क्यूं मौन रह गयी मैं! सुनकर बातें इस जमाने की,
रोक देती, टोक देती, न होती ग्लानी कोई, न कोई डर।
जब भी करूं मैं प्रीत, तो वह हो शिखर-सा सदृश्य,
महसूसे ही नहीं सब उसको, देख भी ले हर नजर।
त्याग से बड़ी नहीं कोई प्रीत माना मैंने ‘कनक’,
क्षितिज पर छाये वो, मेरे दिल में है जिसका घर।
- कोमल वर्मा ‘कनक’
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