शुक्रवार, मई 18, 2012

आंखें

सरेआम न जाने क्या-क्या कह जाती हैं आंखें।
दिल की तमाम  हसरतें बया कर जाती हैं आंखें।

आंखों में सजाया है तुझको, पलकों में छिपाया,
टीस उठे दिल में, तब दवा हो जाती हैं आंखें।

जिधर देखा, नित्य बदलता मौसम देखा मैंने,
कभी पतझड़ तो कभी सावन हो जाती हैं आंखें।

उसकी चाहत को कोई आयाम न दे पायी मैं,
कुछ पल दोस्ती का साथ निभा जाती हैं आंखें।

तमाम स्याह जख्म जिस्म पर किसको दिखलाएं,
दवा बन जाती है जब जख्म सहलाती हैं आंखें।

  •  कोमल वर्मा ‘कनक’


8 टिप्‍पणियां:

  1. आँखें सच ही सब कुछ बयां कर देती हैं ...सुंदर प्रस्तुति

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  2. कोमल जी, बेहतरीन भाव ... बहुत सुंदर रचना प्रभावशाली प्रस्तुति

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  3. Meri Is koshish ko srahne ke liye dhanyad sangeeta ji..

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  4. Ji kuch is kadar bolti hai ye aankhen.... blog per ane ke liye dhanyabad mukesh ji..

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