सरेआम न जाने क्या-क्या कह जाती हैं आंखें।
दिल की तमाम हसरतें बया कर जाती हैं आंखें।
टीस उठे दिल में, तब दवा हो जाती हैं आंखें।
जिधर देखा, नित्य बदलता मौसम देखा मैंने,
कभी पतझड़ तो कभी सावन हो जाती हैं आंखें।
उसकी चाहत को कोई आयाम न दे पायी मैं,
कुछ पल दोस्ती का साथ निभा जाती हैं आंखें।
तमाम स्याह जख्म जिस्म पर किसको दिखलाएं,
दवा बन जाती है जब जख्म सहलाती हैं आंखें।
- कोमल वर्मा ‘कनक’
वाह बहुत खूब ...
जवाब देंहटाएंइस पोस्ट के लिए आपका बहुत बहुत आभार - आपकी पोस्ट को शामिल किया गया है 'ब्लॉग बुलेटिन' पर - पधारें - और डालें एक नज़र - 'क्रांतिकारी विचारों के जनक' - बिपिन चंद्र पाल - ब्लॉग बुलेटिन
आँखें सच ही सब कुछ बयां कर देती हैं ...सुंदर प्रस्तुति
जवाब देंहटाएंकोमल जी, बेहतरीन भाव ... बहुत सुंदर रचना प्रभावशाली प्रस्तुति
जवाब देंहटाएंye khubsurat aankhen...:)
जवाब देंहटाएंDhanyad shivam ji
जवाब देंहटाएंMeri Is koshish ko srahne ke liye dhanyad sangeeta ji..
जवाब देंहटाएंDhanyabad babul Sir ji ...
जवाब देंहटाएंJi kuch is kadar bolti hai ye aankhen.... blog per ane ke liye dhanyabad mukesh ji..
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