सरेआम न जाने क्या-क्या कह जाती हैं आंखें।
दिल की तमाम हसरतें बया कर जाती हैं आंखें।
टीस उठे दिल में, तब दवा हो जाती हैं आंखें।
जिधर देखा, नित्य बदलता मौसम देखा मैंने,
कभी पतझड़ तो कभी सावन हो जाती हैं आंखें।
उसकी चाहत को कोई आयाम न दे पायी मैं,
कुछ पल दोस्ती का साथ निभा जाती हैं आंखें।
तमाम स्याह जख्म जिस्म पर किसको दिखलाएं,
दवा बन जाती है जब जख्म सहलाती हैं आंखें।
- कोमल वर्मा ‘कनक’