खुशबूओं को मिले रास्ता, गुलों की ख्वाहिश है।
मत बांधो वेग को, हवाओं की यह गुजारिश है।

सांझ को लौट आएंगें, शजर की यह ख्वाहिश है।
यह जख्म आखिरी हो, हमदम चाहती हूं मैं,
आंचल डाल दूं, नहीं कोई जख्म-ए-नुमाइश है।
जो कह दूं चाहते कम हो, सादगी है यह हमारी,
कम न लगे तुम्हें कभी, इश्क की यह आजमाइश है।
अपने दिल की दुनियां में दे दो पनाह मुझको,
निगाहों में बसा लो मुझको, हमारी यह गुजारिश है।
- कोमल वर्मा ‘कनक’